Friday, 25 April 2014

'नींद'

Being an insomniac,  it's my duty to write on it :)

देर रात तक जब घर नहीं आती तू, ए
'नींद', तेरी फिक्र में हम सो नहीं पाते..

यूँ अकेली ना घुमा कर, ज़माना ख़राब है,
कब क्या हादसा हो जाए, कह नहीं पाते..

कल रात तेरा चोरी से आना, खिड़की के रास्ते, देख
लिया सब ने; पड़ोसी अब मेरा भरोसा कर नहीं पाते..

देर से आना और जल्दी निकल जाना, तेरा
मुक़ाबला तो गवर्नमेंट वाले भी कर नहीं पाते !

तेरी तो लत लगी है हर एक शक्सको,
देख, तेरे बिना लोग जी भी नहीं पाते..

तेरी राह तके कितनी बज़्मों में शरीक हुए है,
तेरी नाराज़गी के डर से कुछ बोल नहीं पाते..
[बज़्म = महफ़िल]

सोचा, ये नज़्म लिखने तक तेरा आना हो जाएगा,
लेकिन, आने के बारे में तेरी सोच सोच नहीं पाते..

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